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13 August, 2017

पर्यावरण-पादप-प्रबंधन पर प्रदूषण पिल पड़ा-


चित्र में ये शामिल हो सकता है: 1 व्यक्ति, खड़े रहना और बाहर

गौ-बैल के खूंटे उखड़ते, घोंसले भी गिर गये।
हर शाख से उल्लू उड़े, तरु-देव के दिन फिर गये।
आराम करते थे कभी जिस छाँह में वे बैठकर 
आरा उठा आराध्य तरु को काटने आखिर गये।।

जब जलजला जंगल जला तो वृक्ष कैसे है खड़ा।
पर्यावरण-पादप-प्रबंधन पर प्रदूषण पिल पड़ा।
इस राष्ट्र के उत्थान का जो पथ चुना सरकार ने
लथ-पथ पड़े इस पेड़ से जाती तनिक सी हड़बड़ा।।

पड़े हैं पेड़ के पीछे, लिया फल फूल औषधि सब।
दिया छाया जलावन भी, हवा भी शुद्ध करता जब।
कुल्हाड़ी बेंट पा जाती, मिला था मूँठ आरे को
उन्हें अब तख्त की चाहत, तभी आरा चलाते अब।
कुंडलियां छंद 
आरामिक बैठा रहा, फरमाए आराम |
आरा ले आराति तब, रहा खोजता काम |
रहा खोजता काम, नजर डाली पर डाली |
आरा रहा चलाय, मूक फिर भी बनमाली |
करता रविकर खून, सकल सम्पदा सँहारा |
बंजर धरती होय, चले आरा पर आरा ||

सम्पत्ति सत्ता संग तो सम्मान भी रहता डरा-

खरगोश सी आती हमेशा दौड़कर बीमारियाँ ।
कछुवा सरिस जाती मगर तन तोड़कर बीमारियाँ।
कछुवा सरिस पैसा सदा रविकर इधर आता रहा।
खरगोश सा लेकिन हमेशा दौड़कर जाता रहा।।

त्यागी-विरागी का जहाँ सम्मान था आदर भरा।
था सेठ की सम्पत्ति से असहाय को भी आसरा।
सत्ता रही हितकर करों में किन्तु तीनों साथ अब
सम्पत्ति सत्ता संग तो सम्मान भी रहता डरा।।

मत अश्रु रोको तुम कभी जब याद तड़पाने लगे।
रोको हितैषी को अगर वो रूठकर जाने लगे।
रविकर उड़ाना मत हँसी मजबूर की कमजोर की
रोको हँसी मुस्कान वह , यदि चोट पहुँचाने लगे।।

मदर सा पाठ लाइफ का पढ़ाता है सिखाता है।
खुदा का नेक बन्दा बन खुशी के गीत गाता है।
रहे वह शान्ति से मिलजुल, करे ईमान की बातें
मगर फिर कौन हूरों का, उसे सपना दिखाता है।।

मुसीबत की करो पूजा, सिखाकर पाठ जायेगी।
करो मत फिक्र कल की तुम, हँसी रविकर उड़ायेगी।
यहाँ तो मौत आने तक मजे से हंस गाता है ।
वहीं वह मोर नाचा तो, मगर आँसू बहाता है।।

नख दंत वाले सींग वाले पालतू से दस कदम।
पशु जंगली घातक अगर दो सौ कदम तब दूर हम।
पशु किन्तु मतवाला अगर तो दृष्टि से ओझल रहूँ ।
मद का नशा पद का नशा मदिरा नशा से कौन कम।।

मुझे मदिरा चढ़े जब भी मुझे मालूम पड़ जाता।
मुहल्ला जान जाता है, जमाने को मजा आता।
तुझे मद का नशा भारी नहीं क्यों जान पाते तू
पता सबको लगा लेकिन नहीं तू क्यों पता पाता।।

अजी क्या वक्त था पहले, घड़ी तो एक थी लेकिन।
सभी के पास टाइम था, गुजरते थे खुशी से दिन।।
सभी के पास मोबाइल, घड़ी भी हाथ में सबके।
गुजरता किन्तु यह जीवन, सभी का आज टाइम बिन।।

भगवान के आकार पर वह शिष्य करता प्रश्न जब।
आकाश में उस यान को दिखला रहे आचार्य तब।
नजदीक ज्यों ज्यों आ रहा आकार बढ़ता यान का।
त्यों त्यों बढ़े ब्रह्मांड सा आकार-अणु भगवान का।।

03 August, 2017

मुस्कान मेरी मौन मेरा शक्तिशाली अस्त्र हैं-

प्राय: समस्या से यहाँ कुछ लोग बेहद त्रस्त हैं। 
मुस्कान मेरी मौन मेरा शक्तिशाली अस्त्र हैं।
रविकर समस्यायें कई-मुस्कान से नित हल करे
फिर मौन रहकर वह समस्यायें नई रखता परे।।

कर सद्-विचारों का समर्थन दे रहा शुभकामना।
कुत्सित विचारों की किया रविकर हमेशा भर्त्सना।
पहचानना लेकिन कठिन सज्जन यहाँ दुर्जन यहाँ।
मुखड़े लगा के आदमी, करता यहाँ जब सामना।।

खिलाई थी सँवारी थी गया बचपन गई आया |
अँधेरे में सदा छोड़े बदन का साथ हम-साया |
बुढ़ापे में निभाती कब कभी अपनी तरुण काया |
चिता पर लेटते ही तो यहीं छूटे सकल माया ||

पुन: छोड़े अँधेरे में हमारा साथ हमसाया।
बुढ़ापे में हुई रविकर नियन्त्रण मुक्त मम काया।
मगर मद लोभ बढता क्रोध प्रतिपल काम भरमाये
चिता पर लाश लेटी तो, यहीं छूटी सकल माया।

31 July, 2017

गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।

 गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।
कहाँ चन्दन लगाया है, कहाँ माला चढ़ाते हो।।

चलो उस पार्क में चलते, जहाँ कुछ वृद्ध आते हैं।
स्वजन सब व्यस्त हैं जिनके, चलो उनको हँसाते हैं।
सुनेंगे बात उनकी हम, कहो क्या साथ आते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।१।।

मिली गम्भीर हालत में, चिकित्सा कक्ष में लेटी।
प्रसव कल ही हुआ जैसे, लगे नवजात है बेटी।
चलो रविकर मदद करने, अगर तुम भी कमाते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।२।।

उड़ाये चार आतंकी, लगाया जान की बाजी ।
दिया बलिदान सैनिक ने, विकल पत्नी पिता माँ जी।
चलो ढाँढस बँधाते हैं, शहादत क्यूँ भुलाते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।३।।

हँसे ग्राहक खटे छोटू पड़ी बीमार माँ घर पर।
बहन छोटी करे सेवा कभी हँसकर कभी रो कर।
चलो देखो बड़ा कितना, हँसी जिसकी उड़ाते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।४।।




30 July, 2017

गवाही में अदालत को, हुई शादी बताता है-


कहे चालाक हर-गंगे, फिसलने पर नहाता है।
कृपण की जेब जब कटती, किया है दान, गाता है।
किसी की लुट रही अस्मत, खड़ा था मौन तब कायर--
गवाही में अदालत को, हुई शादी बताता है।



भयंकर हो रही बारिश, भयंकर जलजला आता।
लगे सब खोजने आश्रय, मनुज खग जीव घबराता।
तभी उस बाज को देखा, उड़ा वह मेघ के ऊपर।
कभी हिम्मत दिखाने से, नहीं वह बाज आता है।।



हुई कुल कोशिशें असफल, हँसी दुनिया उड़ाती है।
कभी हिम्मत नही हारा, सफलता हाथ आती है।
उड़ाते थे हँसी जो तब, उड़े हैं होश अब उनके
बुराई आज करते वे, उन्हें ईर्ष्या जलाती है।।



छोटे-बड़े झगड़े कई सम्पत्ति के होते रहे।
अपमान नारी का हुआ तो धैर्य नर खोते रहे।
पर भूमि के टुकड़े कई अभिशप्त सदियों से रहे
तलवार भाले गन मिसाइल तोप जो बोते रहे।।



जब भक्ति से भोजन बने तो भोग भोजन को कहे।
तब भूख को भी भक्ति से उपवास कह हर्षित सहे।
जब भक्ति से प्रभु पग धुले तो नीर चरणामृत हुआ।
यदि भक्तिमय है व्यक्ति तो मानव उसे हम कह रहे।।



कामार्थ का बैताल जब शैतान ने बढ़कर गढ़ा।
तो कर्म के कंधे झुका वो धर्म के सिर पर चढ़ा।
मुल्ला पुजारी पादरी परियोजना लायें नई
गिरिजाघरों मस्जिद मठों को पाठ वे देते पढा।



कीड़े-मकोड़े पक्षियों ने जिंदगी भर खूब खाये।
कीड़े-मकोड़े पक्षियों को किन्तु मरने पर पचाये।
गुजरात के जिस सिंह पर वह तीर वर्षों तक चलाया।
उसके चरण में आज रविकर पद्म की माला चढ़ाये।



मनस्थिति क्रोध की हो यदि, कभी निर्णय नहीं लेना।
अगर मन अत्यधिक हर्षित वचन बिल्कुल नही देना।
सदा परिणाम दें घातक विकट दोनो परिस्थितियाँ
करेगा वक्त शर्मिन्दा जमाने से मिले ठेना।।



हथेली की लकीरों से फकीरों को कहाँ मतलब।
हवाले जब हुआ रब के सँवारेगा वही तो अब।
लकीरों के फकीरो अब जरा तुम भी सुधर जाओ।
भरोसे भाग्य के झोली भरी है मित्र रविकर कब।।



जगत है विश्वविद्यालय, मनुज कुछ पाठ नित पढता|
परीक्षा जिंदगी देती, परिश्रम भाग्य फिर गढ़ता |
करेक्टर सी मिले डिग्री, कमाता नाम पढ़-पढ़ के 
मगर कुछ शोध कर रविकर, फटाफट सीढियाँ चढ़ता ||