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11 December, 2017

जिन्हें थी जिंदगी प्यारी, बदल पुरखे जिए रविकर-

(1)
विदेशी आक्रमणकारी बड़े निष्ठुर बड़े बर्बर |
पराजित शत्रु की जोरू-जमीं-जर छीन लें अकसर |
कराओ सिर कलम अपना, पढ़ो तुम अन्यथा कलमा  
जिन्हें थी जिंदगी प्यारी, बदल पुरखे जिए रविकर ||

(2)
उमर मत पूछ औरत की, बुरा वह मान जायेगी।
मरद की आय मत पूछो, उसे ना बात भायेगी।
फिदाइन यदि मरे मारे, मियाँ तुम मौन रह जाना।
धरम यदि पूछ बैठे तो, सियासत जान खायेगी।।

(3)
मदर सा पाठ लाइफ का पढ़ाता है सिखाता है।
खुदा का नेक बन्दा बन खुशी के गीत गाता है।
रहे वह शान्ति से मिलजुल, करे ईमान की बातें
मगर फिर कौन हूरों का, उसे सपना दिखाता है।।

04 December, 2017

हाहा हहा क्या बात है। हालात् है।।

दरमाह दे दरबान को जितनी रकम होटल बड़ा।
परिवार सह इक लंच में उतनी रकम दूँ मैं उड़ा।
हाहा हहा क्या बात है। उत्पात है।

तौले करेला सेब आलू शॉप पर छोटू खड़ा।
वह जोड़ना जाने नहीं, यह जानकर मैं हँस पड़ा।
हाहा हहा क्या बात है। औकात है।।

जब शार्ट्स ब्रांडेड फाड़कर घूमे फिरे हीरोइने।
तो क्यों गरीबी बेवजह अंगांग लगती ढापने।
हाहा हहा क्या बात है। क्या गात है।।

जब जात पर जब पात पर जब धर्म पर जनगण बँटा।
तब दाँव अपना ताड़के नेता बना रविकर डटा।
हाहा हहा क्या बात है। हालात् है।।

30 November, 2017

मनाओ मूर्ख अधिकारी, अधिक सम्मान दे करके

अपेक्षा मत किसी से रख, किसी की मत उपेक्षा कर ।
सरलतम मंत्र खुशियों का, खुशी से नित्य झोली भर।
समय अहसास बदले ना, बदलना मत नजरिया तुम
वही रिश्ते वही रास्ता वही हम सत्य शिव सुंदर।।

आलेख हित पड़ने लगे दुर्भाग्य से जब शब्द कम।
श्रुतिलेख हम लिखने लगे, नि:शब्द होकर के सनम। 
तुम सामने मनभर सुना, दिल की सुने बिन चल गयीं
हम ताकते ही रह गये, अतिरेक भावों की कसम।।

अकेले बोल सकते हो मगर वार्त्ता नहीं मुमकिन।
अकेले खुश रहे लेकिन मना उत्सव कहाँ तुम बिन।
दिखी मुस्कान मुखड़े पर मगर उल्लास गायब है
तभी तो एक दूजे की जरूरत पड़ रही हरदिन।।

बड़ी तकलीफ़ से श्रम से, रुपैया हम कमाते हैं ।
उसी धन की हिफाज़त हित बड़ी जहमत उठाते हैं।
कमाई खर्चने में भी, निकलती जान जब रविकर 
कहो फिर जिंदगी को क्यों कमाने में खपाते हैं।।

मनाओ मूर्ख अधिकारी, अधिक सम्मान दे करके।
अगर लोभी प्रशासक है, मनाओ दान दे करके।
प्रशासक क्रूर यदि मिलता, नमन करके मना लेना।
मगर विद्वान अफसर को, हकीकत सब बता देना।।

09 November, 2017

सात वचन


चले जब तीर्थ यात्रा पर मुझे तुम साथ लोगे क्या।
सदा तुम धर्म व्रत उपक्रम मुझे लेकर करोगे क्या।
वचन पहला करो यदि पूर्ण वामांगी बनूँगी मैं

बताओ अग्नि के सम्मुख, हमेशा साथ दोगे क्या।।
सात वचन/2
कई रिश्ते नए बनते, मिले परिवार जब अपने।
पिता माता हुवे दो दो, बढ़े परिवार अब अपने।
करोगे एक सा आदर, वचन यदि तुम निभाओगे।
तभी वामांग में बैठूँ बने सम्बन्ध तब अपने।।

सात वचन/3
युवा तन प्रौढ़ता पाकर बुढ़ापा देखता आया।
यही तीनों अवस्थाएं हमेशा भोगती काया।
विकट चाहे परिस्थिति हो, करो मेरा अगर पालन।
तभी वामांग में बैठूँ, बनूँ मैं सत्य हमसाया।।

सात वचन/4
अभी तक तो कभी चिंता नहीं की थी गृहस्थी की।
हमेशा घूमते फिरते रहे तुम खूब मस्ती की।
जरूरत पूर्ति हित बोलो बनोगे आत्मनिर्भर तो
अभी वामांग में बैठूँ, शपथ लेकर पिताजी की।।

सात वचन /5
गृहस्थी हेतु आवश्यक सभी निर्णय करो मिलकर।
वचन दो मंत्रणा करके, करेंगे हर समस्या हल।
सकल व्यय-आय का व्यौरा बताओगे हमेशा तुम
वचन दो तो अभी वामांग में बैठूँ इसी शुभ पल।।

सात वचन (6)
अगर सखियों सहित बैठी नहीं मुझको बुलाओगे।
कभी भी दुर्वचन आकर नहीं कोई सुनाओगे।
जुआ से दुर्व्यसन सब से रहोगे दूर जीवन में
अभी वामांग में बैठूँ, वचन यदि यह निभाओगे।।

सात वचन (7)
पराई नारि को माता सरिस क्या देखता है मन।
रहे दाम्पत्य जीवन में परस्पर प्रेम अति पावन ।
कभी भी तीसरा कोई करे क्यों भंग मर्यादा-
वचन दो तो ग्रहण करती, अभी वामांग में आसन।।

विशुद्ध व्यक्तिगत
कुंडलियां छंद
ताके ध्रुव-तारा अटल, संग वैद्य उदरेश |
धर डाक्टर राजेंद्र सह, पुरखे नाना वेश | 
पुरखे नाना वेश, अग्नि प्रज्वलित कराएं |
होता मंत्रोच्चार, सात फेरे लगवायें | 
वर-वधु को आशीष, रहे दे, अपने आके | 
होय अटल अहिवात, अटल ध्रुवतारा ताके |

हरिगीतिका 
सद्ज्ञान-विद्या धाम शुभ,परिवेश नैसर्गिक छटा |
सद्भावनामय जौनपुर की मेघदूती शुभ घटा |
अरविन्द संध्या की सुता-सौभाग्य प्रियषा कौमुदी |
जय जय चिरंजीवी सुमित, शुभ पंचमी अगहन सुदी ||

वर पक्ष
शशिधर ने शशि को सौंप दिया।
खिल जाता लक्ष्मीकान्त हिया।
उस क्षीरजलधि की हलचल ने
तब सुमित-अमितमय विश्व किया।।

विनीत/दर्शनाभिलाषी
कमला दशरथ रविशंकर सौरभ कौस्तुभ अम्बुज संग पधारे |
सनतोष सरोज मनोज सुनील बृजेश शुभम अरु वैभव द्वारे |
लछमी ऊंकार ऋषभ दिवयांश विवेक ललित सुरयांश निहारे| 
अब अंकित आयुषमान विपुल मिसरा कुल के परिजन गण सारे

नाना पक्ष
विद्यासागर शुक्ल जी, इंद्रा जी के साथ।
नातिन के शुभ व्याह में, दिखे बँटाते हाथ।
दिखे बँटाते हाथ, साथ आशीष दे रहे।
राघवेंद्र देवेन्द्र, बलैया साथ ले रहे।
संग हरेंद्र रमेंद्र, प्राप्त होता शुभ अवसर।
देते सब आशीष, महात्मन विद्या सागर।।

शशिकांत राधाकांत मौसा भी उपस्थित हैं यहाँ।
ढोलक बजाने मे मगन हीरावती दादी जहाँ।
नानी जमा चाची जमा मौसी बुआ मामी सभी
वर पक्ष को अतिप्रेम से गाली सुनाती हैं वहाँ।।

06 November, 2017

चढ़े बदन पर जब मदन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाय


है भविष्य कपटी बड़ा, दे आश्वासन मात्र।
वर्तमान से सुख तभी, करते प्राप्त सुपात्र।।



मक्खन या चूना लगा, बोलो झूठ सफेद।

यही सफलता मंत्र है, हर सफेद में भेद।



चढ़े बदन पर जब मदन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाय।

खजुराहो को देखते, चित्रकूट पगलाय।।



समय सुनाता फैसला, हर गवाह जब मौन।

सजा मिली थी देह को, गया गया फिर कौन।